ARJUN vs MEENA DEVI
Party Details
- ARJUN
- MEENA DEVI
Case Summary
ARJUN filed Case No. 2316 in the District Court on 4 Aug 2023 against MEENA DEVI. The case has undergone 2 hearings over 14 days. The case is currently pending. 1 order has been issued in this matter.
Hearing History (2)
- 25AUG 2023DisposedView Order ↗
Judge: Addl. Chief Judicial Magistrate (ACJM)
- 11AUG 2023HearingView Order ↗
Judge: Addl. Chief Judicial Magistrate (ACJM)
Orders (1)
- 25AUG 2023Copy of OrderView Order ↗
Order No: 1
Judgement DetailsView full order PDF ↗
न्यायालय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट - बहराइच । मु०नं०- 2316/2023 अर्जुन------बनाम-------मीना देवी आदि। अन्तर्गत धारा-156(3) दं०प्र०सं०। थाना-रूपईडीहा, जनपद-बहराइच। दिनांक 25-08 -2023 पत्रावली पेश हुयी। पुकार पर प्रार्थी मय विद्वान अधिवक्ता उपस्थि त। विद्वान अधिवक्ता को प्रार्थना पत्र 156(3) दं०प्र०सं० पर पूर्व में सुना जा चुका है। पत्रावली आज वास्ते आदेशार्थ नियत है। प्रार्थना पत्र 156(3) दं०प्र०सं० प्रस्तुत कर प्रथम सूचना अंकित कर विवेचना कराये जाने की याचना की। प्रार्थना पत्र के आलोक में संबंधित थाने से "इस आशय की आख्या प्राप्त है कि प्रार्थना पत्र में वर्णित कथानक के संबंध में कोई अभियोगग पंजीकृत होना नहीं पाया गगया है।" प्रलेखीय साक्ष्य के रुप में स्वयं का शपथ पत्र, छायाप्रति प्रार्थना पत्र श्रीमान् प्रभारी निरीक्षक महोदय थाना रुपईडीहा बहराइच, छायाप्रति प्रार्थना पत्र श्रीमान् पुलिस अधिक्षक बहराइच मय डाक रसीद व छायाप्रति आधार कार्ड दाखि ल किया गगया है। प्रार्थी का प्रार्थना पत्र धारा 156(3) द०प्र०सं० में प्रस्तुत कर संक्षिप्त कथन इस प्रकार है कि प्रार्थी और विपक्षीगगण एक ही गगांव के निवासी है। प्रार्थी अपने परिवार के साथ दिनांक 31-07-2023 को शाम करीब 8.30 बजे अपने पत्नी व बच्चो के साथ घर में बैठकर खाना खा रहा था कि उपरोक्त विपक्षीगगण एक राय होकर जबरन घर में घुस आये और कहने लगगे कि जो तुम्हारे भाई छब्बू ने हम लोगगों के खि लाफ दिनांक 08-07-2023 को मुकदमा थाने पर लिखाया है उसमें चलकर सुलह कर लो नहीं तो तुमको व तुम्हारे भाईयों को बलात्कार और हरिजन एक्ट लगगवा देंगगे। जब प्रार्थी व उसकी पत्नी ने विरोध किया तो सभी विपक्षीगगण, प्रार्थी को व उसकी पत्नी को घर में घुसकर मारने पीटने लगगे और माँ, बहन की गगन्दी-गगन्दी गगालियां देने लगगे और विपक्षी छांगगुर ने प्रार्थी की पत्नी का गगलत नियत से स्तन दबाने लगगे और सलवार भी फाड़ दिया और कहा कि तुमको कही मुह दिखाने वाला नहीं छोड़ेगगे। घर में रखा सामान तोड़ फोड़ दिया और बक्शे में रखा मु० 12,000/-रू० लूट लिया। शोर गगुहार पर गगांव के तमाम लोगग आ गगये और बीच बचान कराया। प्रार्थी व उसकी पत्नी की जान विपक्षीगगण से बचायी। विपक्षीगगण सरकश व दबंगग किस्म के लोगग है हरिजन होने का नाजायज फायदा उठाकर प्रार्थी व उसकी पत्नी को गगांव से उजाड़ने े उजाड़ने की धमकी देते है। प्रार्थी ने उपरोक्त घटना की सूचना थाने पर दिया कोई कार्यवाही न होने पर श्रीमान पुलिस अधीक्षक बहराइच को दि० 03-08-2023 को रजिस्टर्ड डाक प्रार्थना-पत्र दिया किन्तु पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नहीं हुई। अतः कहीं से कोई कार्यवाही न होने के कारण प्रार्थी विवश होकर श्रीमान् जी के समक्ष धारा 156(3) Cr.P.C. का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर रहा है। प्रार्थी के विद्वान अधिवक्ता को सुनने व समस्त पत्रावली का अवलोकन करने के पश्चात यह स्पष्ट होता है कि प्रार्थी एवं विपक्षीगगण एक ही गगांव के हैं। प्रार्थी के अनुसार विपक्षीगगण द्वारा उसकी व उसकी पत्नी के साथ गगाली गगलौज करने, मारपीट करने, छेडछाड करने, घर के सामान की तोड़ फोड़ करने, झूठे मुकदमें में फंसाने व मु० 12,000/-रु० लूटना बताया गगया है। प्रार्थी, विपक्षीगगण को भली-भांति जानता व पहचानता है तथा सभी तथ्य प्रार्थी के संज्ञान में है। प्रार्थी सभी तथ्यों को स्वयं साबित कर सकता है। प्रार्थी को विपक्षीगगण व गगवाहान की बखूवी जानकारी है। अतः उपरोक्त परिस्थि तियों में मामले की जांच स्वयं न्यायालय द्वारा किया जाना उचित प्रतीत होता है। यदि न्यायालय आवश्यक पायेगगा तो वह धारा 202(2) सी०आर०पी०सी० के तहत जांच भी करा सकता है। प्रकरण को परिवाद के रूप में दर्ज किये जाने से भी न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है। साथ ही समय-समय पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि व्यवस्थाओं में प्रत्येक प्रार्थना पत्र 156(3) में विवेचना आदेश किया जाना आवश्यक नहीं है। यदि न्यायालय समुचित पाता है तो उसे परिवाद के रूप में दर्ज कर सकता है। विधि व्यवस्था 2001(44) ए०एल०आर० पृष्ठ 558 रामबाबू गगुप्ता बनाम राज्य में माननीय उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने अवधारित किया है कि मजिस्ट्रेट को धारा 156(3) द०प्र०सं० के प्रार्थना पत्र को परिवाद के रूप में दर्ज करने का अधिकार है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 2015 (6) एस०सी०सी० 287 में भी यह मत व्यक्त किया गगया है कि धारा 156(3) दं०प्र०सं० के प्रार्थना पत्र पर आदेश पारित करते समय न्यायालय द्वारा विवेक का प्रयोगग करते हुए आदेश पारित किया जाना चाहिए। केवल प्रार्थना पत्र में संज्ञेय अपराध से सम्बन्धि त तथ्यों का उल्लेख करने मात्र से मजिस्ट्रेट न्यायालय क न्यायालय को यह बाध्यता नहीं है कि वह प्रत्येक प्रार्थना पत्र पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश पारित करे। माननीय उच्च न्यायालय द्वारा सुखवासी बनाम स्टेट ऑफ यू०पी० 2008 (1) ए०सी०आर० 179 इलाहाबाद में प्रतिपादित विधि व्यवस्था के प्रकाश में प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 156(3) द०प्र०सं० परिवाद के रुप में दर्ज रजिस्टर किया जाना उचित है। अतः मामले के तथ्य एवं परिस्थि तियों में एवं उपरोक्त सम्मानित विधि व्यवस्थाओं को दृष्टिगगत रखते हुए न्यायालय की राय में मामले को परिवाद के रूप में पंजीकृत स्वयं जांच किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। आदेश प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 156(3) द०प्र०सं० परिवाद के रुप में रजिस्टर हो। पत्रावली वास्ते बयान परिवादी अंतर्गत धारा 200 दं०प्र०सं० दिनांक 25-09-2023 को पेश हो। परिवादी सूची गगवाहान नियत तिथि तक प्रस्तुत करे। (कृष्ण कुमार सप्तम) ए०सी०जे०एम०, बहराइच। JO Code:UP2126