LAKHAN LAL PATEL vs STATE OF CHHATTISGARH
Party Details
- LAKHAN LAL PATEL
- STATE OF CHHATTISGARH
- 2-Inspector General of Police
- 3-Senior Superintendent of Police
Case Summary
LAKHAN LAL PATEL filed Case No. WPCR/472/2021 in the Chhattisgarh High Court on 20 Jul 2021 against STATE OF CHHATTISGARH and 2-Inspector General of Police. The case has undergone 6 hearings over 1 year and 4 months. The case was disposed of on 9 Dec 2022. 9 orders have been issued in this matter.
Hearing History (6)
- 9DEC 2022MOTION HEARING MATTERS
Judge: Hon'ble Shri Justice Sanjay K. AgrawalHon'ble Shri Justice Rakesh Mohan Pandey
- 16NOV 2022MOTION HEARING MATTERS
Judge: Hon'ble Shri Justice Radhakishan Agrawal
- 7SEP 2022MOTION HEARING MATTERS
Judge: Hon'ble Shri Justice Naresh Kumar Chandravanshi
Orders (9)
- 13JAN 2023JudgementView Order ↗
Order No: N/A
- 9DEC 2022OrderView Order ↗
Order No: N/A
- 16NOV 2022OrderView Order ↗
Order No: N/A
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1 ए . एफ . आर . उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ , बिलासपुर रिट याचिका ( दांडिक ) क्रं .- 472/2021 लखन लाल पटेल, आत्मज-स्वर्गीय श्री ओमकार पटेल, आयु लगभग 40 वर्ष, व्यवसाय- नगर निरीक्षक-पुलिस (वर्तमान में नगर निरीक्षक के पद पर थाना कटघोरा में पदस्थ), निवासी-डी-9, बालको, कोरबा, जिला-कोरबा, छत्तीसगढ़। ---- याचिकाकर्ता विरूद्ध 1. छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा सचिव, गृह विभाग, नया रायपुर, मंत्रालय, जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़। 2. पुलिस महानिरीक्षक, बस्ततर रेंज, लालबाग, जगदलपुर, जिला-बस्ततर, छत्तीसगढ़। 3. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जगदलपुर, जिला-बस्ततर, छत्तीसगढ़। ---- उत्तरदाततागण ------------------------------ याचिकाकर्ता की ओर से : श्री शशांक ठाकुर, अधिवक्ता। राज्य/उत्तरदातता(गण) की ओर से : श्री सौम्य राय, पैनल अधिवक्ता। ------------------------------ एवं रिट याचिका ( दांडिक ) क्र .-132/2021 प्रमोद श्रीवास्ततव, आत्मज-स्वर्गीय पी. एन. श्रीवास्ततव, आयु लगभग 51 वर्ष, व्यवसाय- नौकरी, उप निरीक्षक-पुलिस, वर्तमान में चौकी प्रभारी के रूप में थाना-पद्मनाभपुर, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़ में पदस्थ। ----याचिकाकर्ता विरूद्ध 1. छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा सचिव, गृह विभाग, नया रायपुर, मंत्रालय, जिला-रायपुर, छत्तीसगढ़। 2. पुलिस महानिरीक्षक, बस्ततर रेंज, लालबाग, जगदलपुर, जिला-बस्ततर, छत्तीसगढ़। 3. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, जगदलपुर, जिला-बस्ततर, छत्तीसगढ़। ---- उत्तरदातता ( गण ) ------------------------------ याचिकाकर्ता की ओर से : श्री अनिल एस. पांडेय, अधिवक्ता। राज्य/उत्तरदातता(गण) की ओर से : श्री सौम्य राय, पैनल अधिवक्ता। ------------------------------ 2 माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय के . अग्रवाल माननीय न्यायमूर्ति श्री राकेश मोहन पांडेय आदेश बोर्ड से पारितत (13.01.2023) संजय के . अग्रवाल , न्या .
1. चूंकि दोनों रिट याचिकाओं में ततथ्यों और विधि का प्रश्न एक समान है, इसलिए, उन्हें एक साथ सुना गया और इस आदेश द्वारा इनका एक साथ अभिनिर्धारण किया जा रहा है। 2. रहा है। 2. याचिकाकर्ता(गण) प्रमोद श्रीवास्ततव और लखन लाल पटेल दोनों थाना-सिटी कोततवाली, जगदलपुर में दर्ज धारा 420,467,468 और 471 भारततीय दंड संहितत ा के अंततर्गतत अपराध की जांच में शामिल थे और आरोपी अमृतत लाल पैकरा के विरुध्द न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, बस्ततर, जगदलपुर के समक्ष अपराध क्र.- 498/2013 में अभियोग-पत्र प्रस्ततुतत किया गया था। ततदनुसार, उक्त न्यायालय द्वारा विचारण प्रारम्भ किया गया और अंतततत ः न्यायालय के निर्णय दिनांक 20.06.2019 द्वारा आरोपी अमृतत लाल पैकरा को संदेह का लाभ प्रदान कर उपरोक्त अपराधों से दोषषमुक्त कर दिया। यद्यपि, निर्णय की कण्डि का-26 में विद्वान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा दोनों याचिकाकर्तागण के विरुध्द कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई हैं, जिसके आधार पर, उनके विरुध्द दूषितत जांच हेततु एक संयुक्त विभागीय जांच अनुलग्नक-पी/5 के अंततर्गतत प्रारम्भ की गई थी, जिसे इन रिट याचिकाओं के माध्यम से चुनौतती दी गई है। 3. रिट याचिकाओं का विरोध करतते हुए जवाब प्रस्ततुतत किया गया है जिसमें कहा गया है कि की गई टिप्पणियां विधि के अनुसार हैं। 4. संबंधितत याचिकाकर्ता(गण) की ओर से उपस्थितत विद्वान अधिवक्ता श्री अनिल एस पांडेय एवं श्री शशांक ठाकुर ने कथन किया है कि विद्वान विचारण मजिस्ट्रेट द्वारा यह कहतते हुए याचिकाकर्तागण के विरुध्द प्रतिकूल टिप्पणी करना उचितत नहीं था कि, 3 उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करतते समय लापरवाही बरतती और ततो और उनके विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणियां करने से पूर्व सुनवाई का कोई अवसर प्रदान नहीं किया। उनके द्वारा माननीय उच्चततम न्यायालय के न्यायदृष्टांतत राज्य ( एन . सी . टी . दिल्ली ) बनाम पंकज चौधरी और अन्य 1 में पारितत निर्णय का अवलंब लिया गया और कथन किया गया है कि आक्षेपितत निर्णय की कण्डि का-42 और 43 में याचिकाकर्तागण के विरुध्द प्रतिकूल टिप्पणियां को हटाई जानी चाहिए क्योंकि अनुलग्नक पी-5 के द्वारा याचिकाकर्तागण के विरुध्द विभागीय जांच शुरू की गई है। 5. राज्य की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री सौम्य राय का कथन है कि विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा अभिलिखितत यह निष्कर्ष कि, याचिकाकर्तागण ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में लापरवाही बरतती, ततथ्य का सही निष्कर्ष है, इसलिए, याचिकाकर्तागण को कोई अनुततोषष प्रदान नहीं किया जा सकत िया जा सकतता है। 6. हमने पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ताओं को सुना, उनके द्वारा ऊपर प्रस्ततुतत परस्पर विरोधी कथनों पर विचार किया ततथा अभिलेख का परिशीलन अत्यंतत सावधानी पूर्वक किया। 7. यह निर्विवादितत है कि याचिकाकर्तागण समय-समय पर अपराध क्रमांक- 498/2013 की जांच में शामिल थे ततथा अभियुक्त अमृतत लाल पैकरा के विरूद्व चालान प्रस्ततुतत किया गया था और विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा उसे अपराध से दोषषमुक्त करतते हुए कण्डि का-26 में टिप्पणी की गई थी कि उन्होंने लापरवाही बरतती एवं जांच करने में सजग नहीं रहे हैं। कण्डि का-26 निम्नानुसार उद्धृतत किया गया है:- “26 घटना दिनांक को आरोपी किस हैसियतत से संग्रहालय जगदलपुर में पदस्थ था वह संग्रहाध्यक्ष था या नहीं, यह प्रमाणितत नहीं है। कलेक्टर एवं सीईओ जनपद फरसगांव के जांच प्रतिवेदन के आधार पर जे.आर. भगतत द्वारा जांच कर कलेक्टर के निर्देश पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गयी है किंतत ु कलेक्टर एवं सीईओ की उक्त जांच प्रतिवेदन को अनुसंधान अधिकारी द्वारा जप्त ही नहीं किया गया है, न ही उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्ततुतत किया गया है जो कि अनुसंधान अधिकारी की गंभीर लापरवाही है, जिन 7 मजदूरों 1 (2019) 11 SCC 575 4 के संबंध में उनके द्वारा साफ सफाई करना व्यक्त करतते हुए राशि आहरितत की गयी है वे 7 मजदूर वास्ततविक अस्ति त्व में है या नहीं इसके संबंध में साक्ष्य का नितत ांतत अभाव है ततथा अनुसंधान अधिकारी द्वारा ततत्संबंध में भी कोई जांच नहीं की गयी है। पंचनामा प्र. प्री.
7 के साक्षी चंद्रहास मरकाम, संततु राम मरकाम, लक्ष्मण सिंह दीवान ततीनों ने ही इस बातत की पुष्टि नहीं किया है कि घटना दिनांक 01/02/2012 से 10/02/2012 के मध्य भोगापाल स्थितत बुद्धदेव की प्रतिमा की साफ सफाई नहीं करायी गयी थी।" 8. बहुतत पहले वर्ष 1964 में, माननीय उच्चततम न्यायालय के संविधान पीठ द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मोहम्मद नईम 2 के मामले में यह अभिनिर्धारितत किया गया था कि उच्च न्यायालय अपनी अंततर्निहितत अधिकारितत ा का प्रयोग करतते हुए अपने या किसी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों को हटा सकतता है यदि न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग को रोकने हेततु या अन्यथा, न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेततु ऐसा करना आवश्यक हो एवं न्यायालय द्वारा निम्नानुसार मतत व्यक्त किया गया था िया गया था:- “9. हम समझतते हैं कि कि बम्बई उच्च न्यायालय सही है और उच्च न्यायालय अपनी अंततर्निहितत अधिकारितत ा का प्रयोग करतते हुए उसके द्वारा या किसी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों को हटा सकतता है यदि न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग को रोकने हेततु या अन्यथा इसके उद्देश्यों को प्राप्त करने हेततु ऐसा करना आवश्यक हो; ततो यह अधिकारितत ा असाधारण प्रकृति का है और इसका प्रयोग केवल आपवादिक मामलों में ही किया जाना चाहिए।" 9. माननीय न्यायाधिपति(गण) द्वारा, उन व्यक्तियों या प्राधिकारियों के विरुद्ध की गई अपमानजनक टिप्पणियों के हटाये जाने पर विचार करने हेततु भी एक जांच का मानदंडों(टेस्ट) निर्धारितत किया गया है, जिनका आचरण विचार हेततु न्यायालय के समक्ष आतता है, जिसका निर्धारण उनके द्वारा संक्षिप्त में निम्नानुसार किया जाना चाहिए :- (क) क्या वह पक्षकार(व्यक्ति) जिसका आचरण प्रश्नगतत है, वह न्यायालय के समक्ष है या उसके पास स्वयं के विषष य में सफाई देने या बचाव करने का अवसर है?
2 AIR 1964 SC 703 5 (ख) क्या टिप्पणियों को न्यायसंगतत (सही) ठहराने वाले उस आचरण से संबंधितत कोई साक्ष्य अभिलेख पर उपलब्ध है; ततथा (ग) क्या इसके अभिन्न अंग के रूप में प्रकरण के निर्धारण हेततु यह आवश्यक है कि उस आचरण पर ध्यान दिया जाए। यह भी माना गया है कि न्यायिक निर्णय(न्याय दृष्टान्तत) न्यायिक प्रकृति के होने चाहिए एवं साधारणततया इसे निष्कपटतता, उदारतता एवं आत्मसंयमतता से विचलितत नहीं होना चाहिए।" 10. इसी प्रकार, डॉ रघुबीर सरन बनाम बिहार राज्य के मामले 3 में, माननीय उच्चततम न्यायालय ने अभिनिर्धारितत किया है कि उच्च न्यायालय के पास अपरिचितत के विरुद्ध अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय और आदेश में की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों को हटाने की अंततर्निहितत शक्ति है, जब निर्णय व आदेश अंतिम (फाइनल) हो गया हो तत था माननीय न्यायालय द्वारा निम्नानुसार सिद्धांततों को प्रतिपादन किया गया है:- “7-8. उपर्युक्त विवेचना से निम्नलिखितत सिद्धांतत उभर कर सामने आतते हैंः- (1) दांडिक न्यायालय का निर्णय अंतिम होतता है; इसे केवल विधि द्वारा विहितत रीति से अपास्तत या संशोधितत किया जा सकतता है। (2) प्रत्येक न्यायाधीश को, पदानुक्रम में उसका पद (रैंक) जो भी हो, बिना किसी भय या पक्षपातत के किसी भी मामले में अपने विचार व्यक्त करने का अप करने का अप्रतिबंधितत अधिकार होना चाहिए। (3) किसी न्यायाधीश का यह सह-सापेक्ष और स्व-निर्धारितत कर्तव्य है कि वह बिना किसी आधार के अप्रासंगिक टिप्पणी या मतत अभिव्यक्त न करे, विशेषष रूप से ऐसे साक्षियों या पक्षकारों के प्रकरण में जो उसके समक्ष उपस्थितत नहीं हैं, जो उनके चरित्र या प्रतिष्ठा को प्रभावितत करतते हैं। (4) एक अपीलीय न्यायालय के पास ऐसी टिप्पणियों को न्यायिक रूप से सही करने की अधिकारितत ा है, किंतत ु यह केवल आपवादिक मामलों में ऐसा करेगी जहां ऐसी टिप्पणियों से किसी साक्षी या उसके समक्ष उपस्थितत न होने वाले किसी पक्षकार को अप्रतिसंहरणीय क्षति कारितत होगी। 29. जब किसी विशिष्ट प्रकरण में उच्च न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न उत्पन्न होतता है कि क्या ऐसी अपरिभाषितत शक्ति का आश्रय(सहारा) लेना है ततो उसके लिए अत्यधिक सावधानी और सततर्कतत ा बरततना आवश्यक है?इस प्रकार जब किसी व्यथितत पक्षकार द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के आदेश या निर्णय से किसी भी अंश को हटाने के लिए यह कदम उठाया जातता है, ततो 3 AIR 1964 SC 1 6 उसे पूरी ततरह से संततुष्ट होना चाहिए कि शिकायतत किया गया अंश पूरी ततरह से अप्रासंगिक और अनुचितत है, कि अभिलेखों पर इसे यथावतत रखने से उस व्यक्ति को गंभीर नुकसान कारितत होगा जिसे व्यक्ति के संदर्भ में यह है और यह कि, इसके हटाए जाने से निर्णय या आदेश के कारणों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।" 11. इसी प्रकार, निरंजन पटनायक बनाम शशिभूषषण कर 4 के मामले में, माननीय उच्चततम न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा यह अभिनिर्धारितत किया गया है कि उन व्यक्तियों और प्राधिकारियों के विरुद्ध कठोर या अपमानजनक टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए, जिनके आचरण न्यायालय के समक्ष विचार हेततु आतता है जब ततक कि यह प्रकरण के विनिश्चय के लिए वास्ततव में आवश्यक न हो और मोहम्मद नईम (पूर्वोक्त) के प्रकरण में माननीय उच्चततम न्यायालय के न्याय दृष्टांतत का अवलंब लेतते हुए निम्नलिखितत मतत व्यक्त किया गयाः- “24. अततः, यह स्थापितत विधि है कि उन व्यक्तियों और प्राधिकारियों के विरुद्ध कठोर या अपमानजनक टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए जिनके आचरण न्यायालयों के समक्ष विचार करने हेततु आतता है जब ततक कि प्रकरण के विनिश्चय हेततु उस आचरण पर ध्यान देना उसके अभिन्न अंग के रूप में वास्ततव में आवश्यक न हो। हमारा मानना है कि अपीलार्थी के विरू थी के विरूद्व की गई प्रतिकूल टिप्पणियां न ततो उचितत थीं और न अपेक्षितत।” 12. आर . के . लक्ष्मणन बनाम ए . के . श्रीनिवासन 5 के मामले में भी ऐसा ही मतत प्रतिपादितत किया गया है, जिसमें माननीय उच्चततम न्यायालय द्वारा मोहम्मद नईम (पूर्वोक्त) में प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने के लिए निर्धारितत मानदंडों (टेस्ट) का पालन किया है। 13. ए . एम . माथुर बनाम प्रमोद कुमार गुप्ता 6 वाले मामले में, माननीय उच्चततम न्यायालय के न्यायाधीशों ने न्यायिक संयम की आवश्यकतता पर बल दिया है और यह अभिनिर्धारितत किया है कि न्याय के सुव्यवस्थितत प्रशासन हेततु न्यायिक संयम और अनुशासन आवश्यक है ततथा निम्नानुसार मतत व्यक्त किया हैः- 4 (1986) 2 SCC 569 5 (1974) 2 SCC 566 6 (1990) 2 SCC 533 7 “13. न्याय के व्यवस्थितत प्रशासन के लिए न्यायिक संयम और अनुशासन उततना ही आवश्यक है जितत ना कि वे सेना की प्रभावशीलतता के लिए हैं। संयम का कर्तव्य, कार्य की यह विनम्रतता हमारे न्यायाधीशों का निरंततर विषष य होना चाहिए। निर्णय लेने में यह गुण न्यायाधीशों के लिए, सम्मान प्राप्त करने के लिए, उततना ही आवश्यक है जितत ना कि यह न्यायपालिका की स्वततंत्रतता की रक्षा के लिए है। इस परिप्रेक्ष्य में न्यायिक संयम को न्यायिक सम्मान कहा जा सकतता है, अर्थातत न्यायपालिका द्वारा सम्मान। न्यायालय के साथ-साथ राज्य की अन्य समन्वय शाखाओं, कार्यपालिका और विधायिका के समक्ष आने वाले उन लोगों के प्रति सम्मान। एक-दूसरे के प्रति सम्मान होना चाहिए। जब ये गुण विफल हो जातते हैं या जब वादी और जन साधारण को लगतता है कि न्यायाधीश इन गुणों में विफल रहा है, ततो यह न ततो न्यायाधीश के लिए अच्छा होगा और न ही न्यायिक प्रक्रिया के लिए।” 14. माननीय न्यायाधीश(गण) ने आगे यह निष्कर्षितत किया है कि न्यायाधीशों द्वारा असंयमितत टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए ततथा उनके द्वारा निम्नलिखितत मतत व्यक्त किया गया हैः- “14. एक न्यायाधीश का न्यायपीठ शक्ति का स्थान है। न्यायाधीशों के पास न केवल बाध्यकारी निर्णय लेने की शक्ति है, बल्कि उनके निर्णय अन्य अधिकारियों द्वारा शक्ति के उपयोग को भी वैध ठहरातते हैं। न्यायाधीशों का न्यायालय के कार्यक्षेत्र पर पूर्ण और निर्विवाद नियंत्रण होतता है। लेकिन वे बेततुकी टिप्पणियों, अमर्यादितत बयानबाजी या अधिवक्ताओं, पक्षों या गवाहों की ततीखी आ की ततीखी आलोचना करके अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं कर सकतते। हम स्वीकार करतते हैं कि न्यायालय के पास न्यायनिर्णयन के लिए अपने समक्ष आने वाले किसी भी मामले पर अपनी दोषषसिद्धि पर स्वततंत्र रूप से कार्य करने की अंततर्निहितत शक्ति है, लेकिन न्याय के उचितत प्रशासन के लिए यह सर्वोच्च महत्व का एक सामान्य सिद्धांतत है कि उन व्यक्तियों या प्राधिकारियों के विरुध्द अपमानजनक टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए जिनके आचरण पर विचार किया जातता है जब ततक कि मामले के निर्णयन के लिए उनके आचरण पर ध्यान देना बिल्कुल आवश्यक न हो।” 15. मोनीश दीक्षितत बनाम राजस्थान राज्य 7 के प्रकरण में, माननीय उच्चततम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारितत किया गया है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध निंदात्मक टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए और न्यायालय से यह अपेक्षितत है कि वह प्रस्ततावितत 7 AIR 2001 SC 93 8 टिप्पणियां या आलोचनाओं के संबंध में प्रकरण में सुनवाई का अवसर प्रदान करे जिसकी मूल रूप से आवश्यकतता है अन्यथा आपत्तिजनक टिप्पणियां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांततों का उल्लंघन होगी और न्यायालय द्वारा निम्नानुसार अभिनिर्धारितत किया गया हैः- “43. इसके अतिरिक्त, इस न्यायालय ने बार-बार चेततावनी दी है कि किसी भी व्यक्ति के विरुध्द न्यायालय द्वारा कोई भी अपमानजनक टिप्पणी करने से पूर्व, विशेषष रूप से जब ऐसी टिप्पणी संबंधितत व्यक्ति के भविष्य के व्यवसाय (करियर) पर गंभीर परिणाम ला सकतती है, ततो उसे प्रस्ततावितत टिप्पणियों या आलोचनाओं के संबंध में प्रकरण में सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए था। इस ततरह का अवसर बुनियादी जरुरतत है, अन्यथा अपमानजनक टिप्पणी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांततों का उल्लंघन होगा। इस प्रकरण में अ.सा.-30 (देवेंद्र कुमार शर्मा) को ऐसा अवसर नहीं दिया गया था।” 16. प्रकाश सिंह ततेजी बनाम नॉर्दर्न इंडिया गुड्स ट्रांसपोर्ट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड 8 के मामले में उच्चततम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारितत किया गया है कि प्रतिकूल टिप्पणियां ततब ततक नहीं की जानी चाहिए जब ततक कि प्रकरण के विनिश्चय के लिए यह आवश्यक न हो और संबंधितत अधिकारी को अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाना चाहिए ततथा न्यायालय द्वारा निम्नलिखितत मतत व्यक्त किया गया है:- “13. है:- “13. उपरोक्त सिद्धांततों के आलोक में और वादी के आचरण पर टिप्पणी करने के लिए अपीलार्थी द्वारा दिए गए गए स्पष्टीकरण को ध्यान में रखतते हुए, हम संततुष्ट हैं कि उन टिप्पणियों और निर्देशों की आवश्यकतता नहीं है।यह स्थापितत कानून है कि उन व्यक्तियों और प्राधिकारियों के विरुध्द कठोर या अपमानजनक टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए जिनके आचरण पर न्यायालयों के समक्ष विचार किया जातता है जब ततक कि प्रकरण के विनिश्चय के लिए यह उसके अभिन्न अंग के रूप में वास्ततव में आवश्यक न हो। उच्च न्यायालय द्वारा अपीलार्थी के व्यक्तिगतत/सेवा अभिलेख (सेवा पुस्ति का) पर उनके आदेश की प्रति रखने और आदेश की प्रति अधिकारी के निरीक्षण में न्यायाधीश के समक्ष अवलोकन के लिए रखने का निर्देश, वह भी उसे अवसर दिए बिना, निस्संदेह ही, उसके करियर को प्रभावितत करेगा। उपरोक्त निर्देश के आधार पर, अपीलार्थी के कार्य शैली/क्षमतता के बारे में प्रतिकूल निर्णय 8 2009 AIR SCW 3078 9 लेने की पूरी संभावना है। हमारा मानना है कि अपीलार्थी के विरुध्द की गई प्रतिकूल टिप्पणियां न ततो उचितत थी और न ही अपेक्षितत।” 17. उच्चततम न्यायालय ने हाल ही में, अमर पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 9 , गुजरातत राज्य बनाम न्यायमूर्ति आर . ए . मेहतता ( सेवानिवृत्त ) 10 , ओम प्रकाश चौटाला बनाम कंवर भान 11 ततथा उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिल कुमार शर्मा 12 के मामलों में उपरोक्त कथितत निर्णयों में प्रतिपादितत विधि के सिद्धांतत का अनुसरण किया है। 18. उच्चततम न्यायालय द्वारा पंकज चौधरी ( पूर्वोक्त ) के मामले में स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारितत किया गया है कि दोषषपूर्ण/अवैध जांच के मामले में पुलिस अधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिए बिना अपमानजनक टिप्पणी/अभियोजन शुरू करने का निर्देश पारितत नहीं किया जाना चाहिए।न्यायालय द्वारा निम्नलिखितत अभिनिर्धारितत किया गया :- “42.पुलिस अधिकारियों के विरुध्द अपमानजनक टिप्पणियां करतते हुए और उनके विरुद्ध अभियोजन का निर्देश देतते समय, हमारे विचार में, उच्च न्यायालय अपमानजनक टिप्पणी करने से पहले विधि के सुस्थापितत सिद्धांततों को ध्यान में रखने में विफल रहा है, जिन्हें न्यायालयों को नियंत्रितत करना चाहिए। न्यायालय के समक्ष विचाराधीन व्यक्तियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई/अभियोजन शुरू करने के लिए कोई भी अपमानजनक टिप्पणी और निर पणी और निर्देश उनके आधिकारिक करियर पर गंभीर प्रभाव डालेगा। 45. चूंकि उच्च न्यायालय ने 1997 की FIR No.-559 में जांच में शामिल पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना उनकी आलोचना की है, इसलिए अपमानजनक टिप्पणी अपास्तत किये जाने योग्य है इसे दरकिनार किया जा सकतता है।" 19. ऊपर वर्णितत निर्णय का संक्षिप्त विवरण यह दर्शितत करतता है कि यद्यपि न्यायाधीश को किसी भी मामले में अपने विचार व्यक्त करने का अप्रतिबंधितत अधिकार है, किंतत ु न्यायाधीश का यह ततत्संबंधी कर्तव्य है कि वह विशेषष रूप से गवाहों या पक्षकारों के मामले में अनुपयुक्त और अवांछनीय टिप्पणी न करे, जो उनके सामने उपस्थितत नहीं हैं, जो उनके चरित्र और प्रतिष्ठा को प्रभावितत नहीं करतते हैं, जब ततक कि यह मामले के न्यायसंगतत और उचितत निर्णय के लिए बिल्कुल आवश्यक न हो और वह भी उस 9 (2012) 6 SCC 491 10 (2013) 3 SCC 1 11 (2014) 5 SCC 417 12 (2015) 6 SCC 716 10 साक्षी या पक्षकार को, जैसा भी प्रकरण हो, समझाने या प्रतिरक्षा करने का अवसर देने के बाद, न्यायिक निर्णयन न्यायिक प्रकृति के ही होने चाहिए और इसे वादी/पक्षकार के प्रति न्यायिक सम्मान प्रदर्शितत करना चाहिए, जो अपने वाद/प्रकरण में न्यायालय के समक्ष आतते हैं। यह भी सुस्थापितत है कि यह न्यायालय अंततर्निहितत या असाधारण अधिकारितत ा का प्रयोग करतते हुए मोहम्मद नईम ( पूर्वोक्त ) में प्रतिपादितत ततीन मानदंडों(टेस्ट) के बाद अधीनस्थ न्यायालय द्वारा की गई उन टिप्पणियों को हटा सकतता है, यदि ऐसा करना या न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना या आपवादिक मामलों में न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करना वास्ततव में आवश्यक है, जहां उन टिप्पणियों से साक्षी या पक्षकार को अपूरणीय क्षति हो सकतती है, जो न्यायालय के समक्ष उपस्थितत नहीं हैं, यह मानतते हुए कि उन अनुपयुक्त टिप्पणियों को यथावतत रखने से संदर्भितत व्यक्ति को नुकसान होगा ततथा इन टिप्पणियों के हटाने से न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। 20. माननीय उच्चततम न्यायालय द्वारा प्रतिपादितत उपरोक्त सिद्धांततों के आलोक में, इस प्रकरण के ततथ्यों पर वापस आतते हुए, विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा पारितत प्रतिकूल टिप्पणियां विधि द्वारा सुस्थापितत सिद्धांततों के बिल्कुल विपरीतत है।विद्वान मजिस्ट्रेट को जांच में वि ांच में विसंगतियों के लिए कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने से पूर्व याचिकाकर्तागण को सुनने का उचितत अवसर प्रदान करना चाहिए था। 21. विशेषष रूप से, यह प्रत्यर्थीगण/ राज्य का कहना नहीं है कि याचिकाकर्तागण को उन परिस्थि तियों को समझाने का अवसर दिया गया था और इसी ततरह, इस ततरह की प्रतिकूल टिप्पणियां प्रकरण के न्यायपूर्ण निर्णयन के लिए न ततो आवश्यक थीं और न ही न्यायसंगतत थीं। अततः, विचारण न्यायालय द्वारा अपने निर्णय में की गई अपमानजनक टिप्पणियां मोहम्मद नईम और पंकज चौधरी ( पूर्वोक्त ) के मामले में माननीय उच्चततम न्यायालय के न्यायधिपतिगण द्वारा दिए गए निर्णयों का उल्लंघन है, और इस प्रकार, उन टिप्पणियों को यथावतत रखने से उनको विधिक क्षति कारितत होगा और याचिकाकर्तागण के सेवा कैरियर (काल) में यह परिणाम प्रदर्शितत होगा और तत दनुसार प्रतिकूल टिप्पणी अनुचितत होने के कारण न्यायहितत में हटा दी जानी चाहिए। 11 22. उच्चततम न्यायालय द्वारा प्रतिपादितत उपरोक्त सिद्धांततों का पालन करतते हुए, हम इस रिट याचिका को स्वीकार करने के इच्छुक हैं। परिणामस्वरूप, छत्तीसगढ़ राज्य बनाम अमृतत लाल पैकरा के मामले में विचारण मजिस्ट्रेट द्वारा दिनांक 20.06.2019 को कण्डि का- 26 में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों का निष्कासन किया जातता है। कारण बतताओ नोटिस (अनुलग्नक पी-5) के आधार पर विभागीय जांच प्रारम्भ करने और तत त्संबंधितत पश्चाततवर्ती कार्यवाही को निरस्तत किया जातता है। 23. दोनों रिट याचिकाओं को यथा उपरोक्तदर्शितत सीमा ततक स्वीकार किया जातता है। सही/- (संजय के. अग्रवाल) न्यायाधीश सही/- (राकेश मोहन पांडेय) न्यायाधीश एकेएस ----00---- (Translation has been done through AI Tool: SUVAS) अस्वीकरणः हिन्दी भाषषा में निर्णय का अनुवाद पक्षकारों के सीमितत प्रयोग हेततु किया गया है तताकि वो अपनी भाषषा में इसे समझ सकें एवं यह किसी अन्य प्रयोजन हेततु प्रयोग नहीं किया जाएगा । समस्तत कार्यालयी एवं व्यवाहरिक प्रयोजनों हेततु निर्णय का अंग्रेजी स्वरुप ही अभिप्रमाणितत माना जाएगा और कार्यान्वयन ततथा लागू किए जाने हेततु उसे ही वरीयतता दी जाएगी।